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10 January 2016

धीरज न खोयिये ,धीरे- धीरे चलिए

धीरज न खोयिये ,धीरे- धीरे चलिए

धीरज न खोयिये, धीरे -धीरे चलिए,
काम कुछ कर जाईये, रास्ता नया  बनाइये

अगर कुछ कर जायेंगे, तो लक्ष्य नया पा  जायेंगे,

अगर भटक जायेंगे तो ‘कहाँ’ पहुँच  जायेंगे?

धीरे या  तेज चले , फिर भी लक्ष्य पाएंगे

रुक गए गर  कुचल दिए जायेंगे

संघर्ष कुछ कर जाईये, तकलीफें कुछ पाईये

‘नजर’ नहीं हटाईये. चलते -बढ़ते जाईये

कोशिश करते जाईये , चिराग नया जलाईये.

संकल्प मन में लाईये, रास्ते नए बनाईये

पैसे भले कमाईये , रिश्ते नहीं गवांईये,

कुछ नया कर जाईये, नए रास्ते बनाईये.

‘आगाज़’ अगर कर गएँ तो ‘अंजाम’ तक पहुंचायिये,

कुछ नया कर जाईये, उम्मीद ना   मिटाईये.

लिखने लायक बन जाईये,

या पढने लायक लिख जाईये.

इतिहास नया बनाइये

चलते बढ़ते जाईये.

लक्ष्य  नया बनाइये

काम  नया कर जाइये 
 
धीरज न खोयिये ,धीरे-धीरे बढिए .


संजय कुमार
स्टेट बैंक ज्ञानार्जन केंद्र
रायपुर




11 April 2014

तब भी नहीं मरा हूँ|




फिर भी नहीं मरा हूँ 

 सच के साथ खड़ा हूँ तब भी नहीं मरा हूँ|
 कफ़न साथ लिए बढ़ा हूँ, रास्ते अपने खुद गढ़ा हूँ|
 दूब जैसा बढ़ा हूँ जीवन नजदीक से पढ़ा हूँ| 
 समस्या से हरदम लड़ा हूँ पहाड की तरह अड़ा हूँ|
 आग में तपा हूँ| काटों में नंगे पैर चला हूँ, 
 अपमान बा-मुश्किल सहा हूँ |
 फिर भी नहीं मरा हूँ| 
 आगे हरदम बढ़ा हूँ, पहाड की तरह लड़ा हूँ,
 आग की तरह जला हूँ, फिर भी नहीं मरा हूँ | 

  संजय कुमार

sach ke sath khara hun

फिर भी नहीं मरा हूँ सच के साथ खड़ा हूँ तब भी नहीं मरा हूँ| कफ़न साथ लिए बढ़ा हूँ, रास्ते अपने खुद गढ़ा हूँ| दूब जैसा बढ़ा हूँ जीवन नजदीक से पढ़ा हूँ| समस्या से हरदम लड़ा हूँ पहाड की तरह अड़ा हूँ| आग में तपा हूँ| काटों में नंगे पैर चला हूँ, अपमान बा-मुश्किल सहा हूँ | फिर भी नहीं मरा हूँ| आगे हरदम बढ़ा हूँ, पहाड की तरह लड़ा हूँ, आग की तरह जला हूँ, फिर भी नहीं मरा हूँ | संजय कुमार

20 November 2013

फिर भी नहीं मरा हूँ

फिर भी नहीं मरा हूँ सच के साथ खड़ा हूँ तब भी नहीं मरा हूँ| कफ़न साथ लिए बढ़ा हूँ, रास्ते अपने खुद गढ़ा हूँ| दूब जैसा बढ़ा हूँ जीवन नजदीक से पढ़ा हूँ| समस्या से हरदम लड़ा हूँ पहाड की तरह अड़ा हूँ| आग में तपा हूँ| काटों में नंगे पैर चला हूँ, अपमान बा-मुश्किल सहा हूँ | फिर भी नहीं मरा हूँ| आगे हरदम बढ़ा हूँ, पहाड की तरह लड़ा हूँ, आग की तरह जला हूँ, फिर भी नहीं मरा हूँ | संजय कुमार

3 February 2013

जिंदगी एक संग्राम


जिंदगी एक संग्राम
जिंदगी एक  संग्राम है, जीत कर हीं मानेगें |
सामने पहाड़ आये  तो रौंद उसको डालेंगे|
नदी, जंगल कुछ आ जाए, रास्ता बना डालेंगे,
मंजिल पाकर मानेगें, पतवार नहीं अब डालेंगे |

कोई मस्अला मुश्किल नहीं, हल कर उसको डालेंगे |
आओ अब संघर्ष करे, तज्किरा बंद करें|
रात घनघोर  काली हो, भोर न होते वाली हो|
दीप जलाकर लायेंगे, अंधकार हटाकर गायेंगे|

पौधे नए लगाएँगे, फूल  नए खिलाएंगे|
काम बड़े कर जायेंगे, इतिहास नया रच पाएंगे|  
अनीति- अनाचार  हटाएंगे, नया प्रकाश लायेंगे|  
जान अब लड़ायेंगे, असंभव संभव कर पाएंगे |
जब ‘दिनकर’ दिख न पायेगा, घना अंधकार छायेगा |
नया प्रकाशपुंज  आएगा, रोशनी नई फैलाएगा|
गिड़कर- गिड़कर सम्हल जायेंगे, बढते आगे जायेगे|
परिश्रम करते जायेगे, मंजिल अपनी पायेगे|

जिंदगी एक  संग्राम है, जीत कर हीं मानेगें |
सामने पहाड़ आये  तो रौंद उसको डालेंगे|



संजय कुमार


ताज्किरा- चर्चा
मस्अला-समस्या

8 January 2013

क्या बदला है


क्या कुछ बदला हैं ?
                      संजय कुमार, मुख्‍य प्रबंधक, स्‍टेट बैंक ज्ञानार्जन केंद्र, रायपुर

रामलाल ने नई साइकिल खरीदी थी| बहुत खुश था वो और अपने घर लौट रहा था| उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते पर बिजली-बत्ती भी नहीं थी|  अँधेरे में वह एक बड़े से गढ्ढे में गिर गया| बेचारे को जोर से चोट भी लगी और कीचड से लथ-पथ भी हो गया। गढ्ढे से बाहर आने कि हड़बड़ी में वह मोटरसाइकिल पर जा रहे एक छुटभैये नेता से टकरा गया| टक्‍कर खाकर वह भी गढ्ढे में गिर पडा। उसके चम्‍चों ने रामलाल की धुनाई करते हुए कहा-

"सार, तोरा साइकिलों चलाबे ना आवेला"
            (साले, तुम्‍हें साइकिल चलानी भी नहीं आती)
           
            "तोहरा के साइकिल के देहल्‍स"
            (तुम्‍हें ये साइकिल किसने दी ?)

उन लोगों ने उसकी साइकिल भी छीन ली। वह रोता रहा, चिल्‍लाता रहा, पर उसकी सुनने वाला कौन था? बेचारे की वर्ष भर की जमा पूँजी भी छिन गई। और अब काम पर जाने में भी समय ज्‍यादा लगेगा।

दस वर्ष पश्‍चात नेताजी एम एल ए बन गए पर आज भी रामलाल पैदल ही काम पर जा रहा है। नेताजी का मोटरसाइकिल प्रेम अभी भी कायम था। वे मोटरसाइकिल पर तफरी करने निकले थे। उनकी मोटरसा‍इकिल ने सडक के किनारे चल रहे रामलाल को पीछे से टक्‍कर मार दी।  टक्‍कर इतने जोर की थी कि उसका दाहिना पैर टूट गया। तभी पीछे से आवाज आई-
            "अबे साले . . . अइसन चलत बार, जैसे रोडवा तोर बाप के हव।"
            (साले, ऐसे चल रहो हो कि सडक तुम्‍हारे बाप ने बनवाई है।)

24 November 2012

हम हँसते हैं जग गाता है

हम हँसते हैं जग गाता है
जब मेघ घने हो जाते हैं,
घनघोर अँधेरी रातो में|
देख नहीं हम पाते हैं,
बिना चाँद की रातों में |
अनिष्ट की आशंका से,
घबराते हैं, डर जाते हैं |
विफलता के क्षण आते हैं,
हम खड़े नहीं हम पाते हैं |
विश्वास जब डगमग करता हैं,
हम रोते है, जग हँसता हैं|
पानी टिप-टिप पड़ती हैं,
छीटें उसके पड़ते हैं,
हम भीग- भीग कर सोते है,
सिहरन सिकुडन हम सहते है| 
जब रिश्तों के ठंढेपन से,

गहरा सदमा लगता है,
हम पार नहीं कर पाते है,
अलहिदगी तक  सह जाते है|
रिश्तो में बिखरन होती है,
अकेले हम पड जाते है|
मेहनत तब रंग लाती है,
परिस्थिति नई बनाती है,
हम सिखते है कुछ करते है,
नई कहानी गढते है|
अमीक निशा छट जाती है,
प्रतिकूल, अनुकूल बन जाता है
नया सबेरा आता है
हम हँसते है जग गाता है
संजय कुमार
अमीक- गहन
अलहिदगी-पृथकता





16 October 2012

Divaswapna: फिर आज मेरे मन की वीणा

Divaswapna: फिर आज मेरे मन की वीणा: फिर आज मेरे मन की वीणा   कुछ नए नए सुर रचती है कहती है जीवन निर्झर है निर्बाध अहर्निश बहती है....       फिर आज मेरे मन की वीणा....

10 October 2012

पत्थर को शीशे से तरासते देखा है बहुत

पत्थर को शीशे से तरासते देखा है बहुत
पत्थर को शीशे से तरासते हुए देखा हैं बहुत
कोई शीशे को पत्थर से तरासे तो कोई बात बने|
बीते लम्हों को कोसना है बहुत आसान
कोई नया लम्हा बना सके तो कोई बात बने|

समस्या खड़ी करना मेरी फितरत तो नहीं
कोई समस्या सुलझा सके तो कोई बात बने|
हर कोई रास्ते में रोड़ा अटकाए खड़ा है
कोई नया रास्ता बना सके तो कोई बात बने|

आनंद लिया हैं हमने फूलो की खुशबू का बहुत
कोई काँटों की खुशबू ले सके तो कोई बात बने|
जंगलो में देखी हैं शांति बहुत,
कोई शहरों में ला सके तो कोई बात बने|

आदर्शो और मूल्यों की बात करना है आसान,
कोई जीवन में उतार सके तो कोई बात बने|
मिथकों में जीना है तो जी लो मजे से,
अगर हकीकत दिला सके तो कोई बात बने|

समर्थो के लिए करते है सभी कुछ न कुछ,
गरीबो के लिए कुछ करो तो कोई बात बने
धारा में बहना हैं बहुत ही आसान,
धारा की दिशा मोड सको तो कोई बात बने|

सफलता में मुस्कुराते हुए देखा है सभी को
विफलता में हँसकर दिखाओ तो कोई बात बने|
मैंने देखे है लोगो को चाँद पर थूकते हुए
एक नया चाँद बना सको तो कोई बात बने|

मेमने की शक्ल में बहुत देखे भेडिये,
कोई भेडिये को मेमना बना सके तो कोई बात बने|
दंगे कारवाना हैं बहुत ही आसान,
कोई अमन -चैन ला सके तो कोई बात बने|

तुमने भेजे है यहाँ आतंकवादी बहुत
अब अपने घर को बचा सको तो कोई बात बने|
कश्मीर को तोडने की कोशिश की हैं बहुत,
अब सिंध बचा सको तो कोई बात बने |

बाप दादा की कमाई पर इठलाना है बहुत आसान
अपने लिए दो रोटी कमा सको तो कोई बात बने |
कायरो की भीड के अगुआ बहुत बन लिए,
अब बहादुरों की पंक्ति में आ सको तो कोई बात बने|

बहुत मनाई जयंतियां गाँधी, महावीर और गौतम बुद्ध की,
जीवन में उनके मूल्यों को उतार सको तो कोई बात बने|
बहुत बांटी हैं नफरत हिंसा और वैमनस्य,
कुछ प्यार भी बाँट सको तो कोई बात बने|

जो रोज देखते आयें हैं वो देखा बहुत,
कुछ नया कर दिखाओ तो कोई बात बने|

संजय कुमार
स्टेट बैंक ज्ञानार्जन केंद्र, रायपुर

धीरज न खोयिये ,धीरे- धीरे चलिए

धीरज न खोयिये ,धीरे- धीरे चलिए

काम कुछ कर जाईये, रास्ता नया  बनाइये

अगर कुछ कर जायेंगे, तो लक्ष्य नया पा  जायेंगे,

अगर भटक जायेंगे तो ‘कहाँ’ पहुँच  जायेंगे?

धीरे या  तेज चले , फिर भी लक्ष्य पाएंगे

रुक गए गर  कुचल दिए जायेंगे

संघर्ष कुछ कर जाईये, तकलीफें कुछ पाईये

‘नजर’ नहीं हटाईये. चलते -बढ़ते जाईये

कोशिश करते जाईये , चिराग नया जलाईये.

संकल्प मन में लाईये, रास्ते नए बनाईये

पैसे भले कमाईये , रिश्ते नहीं गवांईये,

कुछ नया कर जाईये, नए रास्ते बनाईये.

‘आगाज़’ अगर कर गएँ तो ‘अंजाम’ तक पहुंचायिये,

कुछ नया कर जाईये, उम्मीद ना   मिटाईये.

लिखने लायक बन जाईये,

या पढने लायक लिख जाईये.

इतिहास नया बनाइये

चलते बढ़ते जाईये.

लक्ष्य  नया बनाइये

काम  नया कर जाइये 
 
धीरज न खोयिये ,धीरे-धीरे बढिए .


संजय कुमार
स्टेट बैंक ज्ञानार्जन केंद्र
रायपुर


बात इतनी छोटी सी थी

 बात इतनी छोटी सी थी

बात इतनी छोटी थी
पर तुम जोर से हंसी थी
साड़ी की सलवटो में तुम
क्या खूब  दिखी हो

मोतियों से दांत
किस  तरह बिखर गए थे
लाल रंग  की चूनरी पर तुम क्या फबी थी
बात कितनी छोटी सी थी --- पर तुम जोर से हंसी थी
सुनहले से केश तुम्हारे
किस तरह बिखर गए थे
और तुम किस तरह अनजान खड़ी  थी
जबकि आंख तुम्हारे ढक चुके थे

उस दिन की हीं बात लो
जब हम तुम मिले थे
शरीर तुमने किस तरह सिमटा लिया था
और लाज से किस तरह गड़ गयी थी
होठ तुम्हारे किस तरह सिल गए थे.
हवा  की इक सरसराहट   से तुम
 किस तरह डरी  थी
आंख तुमने पूरी तरह से ढक  लिया था.

 आज जब हम वर्षो साथ रहे हैं
दुखो और सुखो से साथ चले हैं.

 तब बात इतनी छोटी सी थी तुम जोर  से हंसी थी
खुल गए से सारे द्वार
हो गयी थी जिंदगी एक बहार
पर अब ऐसा नहीं होता कोई बताये  एक बार
जबकि बात इतनी बड़ी है 
तुम  नहीं हंसी थी

इस समय  की बात लो
बात  कितनी बड़ी है
पर तुम नहीं हंसी हो

और कितने गीत लिखू तुम पर
जब तुम चुप -चाप खड़ी  हो 
बात कितनी बड़ी थी
 तुम नहीं हंसी हो.


संजय कुमार